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मैं हुँ बचपन

रोज सुबह की सुहानी धुप हुँ मैं,

उगती हुई आशा की किरण हुँ मैं

खुबसूरत और पखुंड़ियों सा कोमल हुँ मैं,

जिंदगी का सबसे खुबसूरत पल हुँ मै

समाज और देश की नींव हुँ मैं

नई उम्मीद हुँ मैं,ख्वाब हुँ मैं।

साथ ही उनको पूरा करने का जरिया भी हुँ मैं

उपर्युक्त पंक्तियों को पढकर खुश हो गया मन

मैं हुँ बचपन :)

यथार्थ में यही हुँ पर वक़्त के साथ वास्तविकता बदल गयी

भोली सी सुरत हुँ

पर गलियारों  में बङी समीतियों का इश्तहार करने वाली आवाज हुँ

छोटी सी उम्र मे पीठ पर बोझ ढोने वाला नाजुक शऱीर हुँ

जन्मसिद्ध अधिकारों में नुक्कङ का कचरा उठाना रह गया है

बडे विश्रामालयों के बाहर गरीबी ने बैठा दिया है

रईसों के जूते साफ़ करने वाला हुँ

जिन्दगी की खुशियों से दूर हुँ

नन्हे हाथों से गरम चाय पकडाने वाला हूँ

नंगे पैर नाच कर करतब दिखाने वालों में शामिल हुँ मैं

मोटर गैराज मे ग्रीस से भरे कपङों मे रहने वाला हुँ मैं

नहीं खाता कोई तरस मुझ पर नहीं देखता कोई लाचारी मेरी

देश की नींव हुँ मैं मजबूत बनाओ मुझे

देश के विकस से हटाओ पतन

देखो मुझे मैं हुँ बचपन ।

 

~ भारती शर्मा

 

(Bharti is a CRY Volunteer from IIT – Kharagpur. To volunteer with CRY, click here)

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