बाल शिक्षा

कल मुलाकात हुई थी, उस बस्ती के गरीब बचपन से,
वो टुट्टी हुई मुंडेरों और वो छतों पे
कल मुलाकात हुई थी

वो कलम तलाशते, राख से भरे हाथो से
वो बर्तन धोते, उन गलियों की दुकानों में
कल मुलाकात हुई थी वो मिट्टी भरे नंगे पैरों से,
वो जो ठिठुरते कांपते इन सर्द हवाओं में
कल मुलाकात हुई थी उन चौबारों में,
वो बचपन कुचलते समाज के ठेकेदारों से,
कल मुलाकात हुई थी उन आशा भरी मासूम आँखों से,
वो सपने संजोती उम्मीद से बेशुमार निगाहों में,
कल मुलाकात हुई थी उस नन्हे दिल की धड़कन से
वो जो शुमार ख्वाहिशों से धड़कती चलती बचपन के बेधड़क उत्साह में
कल मुलाकात हुई थी उन कोमल लबों की हँसी से
वो जो उमंग से खिलखिलाती मुस्कुराती जीवन की हर छोटी बड़ी खुशी में
कल मुलाकात हुई थी उन सूरज की शानदार किरणों से
वो जो निकलती गुज़रती उस बस्ती की दीवार की दरारों से
कहना चाहती थी कि इन बच्चो को भी शिक्षा का आह्वाहन कराओ
इस प्रगति के पथ पर उनके भी भविष्य का आगमन कराओ।

A poem by Hashmeet Kaur, CRY Intern, Delhi

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