NAVNEET KUMAR WRITES…

कभी  गुजरता हूँ  बचपन के उन यादों के सफर पर,
देखता हूँ अपने अाप को  माँ  के आँचल में,
देखता हूँ  खुद को क्रिकेट खेलते  बाबूजी के साथ,
फिर दूर टहल जाता हूँ उन यादों के शहर में,
दादा  के कंधे पर  दुनिया  को देखते  हुए,
दादी के कहानियों से जिन्दगी समझते हुए,
कितनी दूर अा गये हम जिन्दगी के

सफर में ,
बचपन बीत गई  इनकी दुलार में।
टहलते टहलते कब इतनी दूर अा गये पता न चला,
छोटे से कब बड़े हो गये पता न चला,
आज भी मन लौट जाने को कहता है,
दोस्तों के साथ फिर शरारत करने को दिल करता है,
पर मंजिले कब बदल गई पता न चला।
अाअो, चले फिर बचपन की अोर,
करें  उन सुनहरे पलों को याद।

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